अब था एक भयानक पेपर, जिसको कहते है अंग्रेजी,
जिसका परिक्षक है कडूस, या कह्सकते है - एक दर्जी |
दर्जी नहीं तो और क्या कहू, जो नंबर हरदम काटता है,
नंबर काटकर खुद रखलेता, और कतरन हमें थमता है|
पढने बैठकर बस किताब का एक ही टुक लगाया था,
एस बार सारी किताब आएगी, यह याद तभी मुझे आया था|
राम ही जाने केसे केसे, राम भरोसे पढाई करी,
पर विद्यालय में घुसने से पहले, बिल्ली रास्ता काट गई|
पर उसकी परवाह न करके, विद्यालय को पहुचे हम,
पर्चे को देखते ही, उखाड़ने लगा हमारा दम|
पर्चा था सों नंबर का, पर एक नंबर की आस नहीं,
एस बार तो भगवान् भी, हमको पास करवा सकता नहीं|
तभी घंटे का घंटा बजा, जब हाथ पाँव मेरे फूल गए,
दिमाग घूमा, जब देखा, हमने पर्चे पर एक भी शब्द भी लिखा नहीं|
तब हमने कलम को तो शताब्दी ट्रेन बना दिया,
जो मन में आया अटर शटर, वह पर्चे पर उतार दिया|
जो भी प्रशन नहीं याद किये थे, वह भी पर्चे पे दे मारे,
अंत में जब कुछ न सूझा तो, कुछ लतीफे भी दे मारे|
परीक्षा के बाद जब मास्टर जी, हमारी कक्षा में पधारे,
सारे पर्चे छोड़ कर, मेरे हि उत्तर सुना ड़ाले|
बच्चे सारे हस रहे, और मुझको तानो का पात्र बना दिया,
सारे नंबर छोड़ कर, एक अंडा मुझे थमा दिया|